कांग्रेस के लिए संजीवनी से कम नहीं चित्रकूट की जीत

 
कृष्णमोहन झा

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

मध्यप्रदेश विधानसभा के चित्रकूट निर्वाचन क्षेत्र के लिए उपचुनाव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विशेष दिलचस्पी दिखाई थी और चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में तो उन्होंने स्वयं ही भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान की बागडोर थाम ली थी। एक अवसर पर तो उन्होंने चित्रकूट के मतदाताओं से यह वादा तक कर दिया था कि अगर चित्रकूट में भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी जीतता है तो वे अपनी पूरी सरकार को लेकर चित्रकूट आएंगे परंतु चित्रकूट में भाजपा की उम्मीदों पर पानी फिर गया। चमत्कारिक नतीजे की आशा कर रही भाजपा को निराशा ही हाथ लगी। कांग्रेस ने इतने बड़े अंतर से यह सीट जीत ली कि सिवाय यह कहने के भाजपा के पास कुछ नहीं बचा कि पार्टी को जनता का निर्णय स्वीकार है। हार के कारणों की समीक्षा करने की बात हारने वाला दल करता ही है। भाजपा भी कर रही है मुख्यमंत्री और राज्य भाजपा के अध्यक्ष भी कह रहे है कि हार के कारणों की समीक्षा करेंगे परंतु चित्रकूट में भाजपा पिछले 6 दशकों में मात्र तीन बार जीती है बाकी सारे चुनाव कांग्रेस ही जीतती रही है तो फिर समीक्षा करने से इस बार क्या होगा? आखिर पहले भी तो हार के कारणों की समीक्षा की गई होगी परंतु चित्रकूट के मतदाताओं को अपना मानस बदलने के लिए वह तैयार नहीं कर पाई। हार के कारण खोजने में उसकी हर समीक्षा व्यर्थ साबित हो गई। कांग्रेस से यह सीट छीनकर इतिहास रचने का एक और मौका भाजपा के हाथ से जाता रहा। अब अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों तक का समय भाजपा के पास हार के कारणों की समीक्षा करने के लिए है परंतु इस उप चुनाव में भारी भरकम जीत का जश्न मनाने में व्यस्त कांग्रेस अभी से 2018 में सत्ता से वनवास का सुनहरा स्वप्र संजाने लगी है। भले ही उसका यह सुनहरा स्वप्र अभी दूर की कौड़ी प्रतीत होता हो, परंतु इतना तो तय है कि चित्रकूट की जीत ने उसे एक ऐसी संजीवनी प्रदान कर दी है जो अगले विधानसभा चुनावों में उसे सत्ताधारी दल भाजपा को कड़ी टक्कर देने की ताकत प्रदान करने में सक्षम सिद्ध हो सकती है। कांगे्रस के अंदर नया उत्साह जाग उठा है, उसका खोया हुआ मनोबल वापिस लौट आया है और सबसे बड़ी बात यह है कि प्रदेश में कांगे्रस के शीर्ष नेतृत्व में एकजुटता के संकेत दिखाई देने लगे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की यही एकजुटता 2018 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए चिंता का कारण बन सकती है।

प्रदेश भाजपाध्यक्ष नन्दकुमार चौहान ने चित्रकूट में भाजपा प्रत्याशी की हार पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि वहां के मतदाताओं ने परंपरा को चुना है। निश्चित रूप से चित्रकूट कांगे्रस की परंपरागत सीट है इसीलिए कांगे्रस की शानदार जीत की यह भी एक वजह हो सकती है परंतु भाजपा की अपमानजनक पराजय का क्या यह अर्थ भी नहीं निकाला जा सकता है कि मुख्यमंत्री की करिश्माई लोकप्रियता में कहीं न कहीं अंतर आने लगा है। राज्य में इसके पहले हुए 11 विधानसभा उप चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने उप चुनाव जीते है और कांग्रेस के खाते में मात्र 2 सीटें ही आई है इसलिए पलड़ा तो भाजपा का ही भारी दिखाई देता है परंतु चित्रकूट में भाजपा की हार ने पार्टी को क्यों स्तब्ध कर दिया है। दरअसल इस हार के विशेष मायने हैं। वहां पार्टी प्रत्याशी की हार भर नहीं है दरअसल वहां सरकार को भी हार का मुंह देखना पड़ा है। मुख्यमंत्री ने जब यह कहा था कि चित्रकूट में भाजपा प्रतयाशी जीतता है तो वे अपनी पूरी सरकार को वहां लेकर आएंगे तब उसका आशय तो यही था कि मुख्यमंत्री ने खुद भी चित्रकूट उपचुनाव को सरकार की प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। पार्टी की पूरी ताकत के साथ शिवराज सरकार के लगभग सारे मंत्री चित्रकूट में मोर्चा संभाले हुए थे। उत्तरप्रदेश में उप मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य को रोड शो के लिए चित्रकूट बुलाया गया। मुख्यमंत्री ने स्वयं 29 सभाएं, 11 रोड शो किए और तीन दिनों तक वहां डेरा डाले रहे परंतु भाजपा प्रत्याशी की इतने बड़े अंतर से तयशुदा हार को वे नहीं रोक पाए। भाजपा तो चमत्कार की आस लगाए बैठी थी परंतु उसे निराशा ही हाथ लगी। आश्चर्य की बात तो यह है कि जिस गांव में मुख्यमंत्री ने रात गुजारी वहां भी भाजपा को कांग्रेस से कम वोट मिले। मुख्यमंत्री ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में हवा बनाने के लिए जीतोड़ मेहनत की परंतु वे हवा का रूख बदलने में असफल रहे। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री ने चित्रकूट के मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए अनेक घोषणाएं भी की थी जिनमें चित्रकूट को मिनी स्मार्ट सिटी बनाकर विश्व तीर्थ के नक्शें पर लाना और मंदाकिनी नदी का जीर्णोद्धार प्रमुख है परंतु चित्रकूट के मतदाताओं ने तो शायद पहले ही तय कर रखा था कि वे परंपरा को ही चुनेंगे। भाजपा चित्रकूट की जनता के मानस को पढऩे में असफल रही। चित्रकूट में भाजपा की हार के और भी कुछ कारण हो सकते हैं। प्रत्याशी चयन में भूल, चित्रकूट के विकास के सरकारी कदमों से जनता का सुतुष्ट न होना तथा पार्टी नेताओं के आत्म विश्वास में कमी जैसे कारकों ने भाजपा की हार तय करने में बड़ी भूमिका निभाई। दलित और आदिवासी मतदाताओं का झुकाव कांगेस के पक्ष में पहले से ही दिखाई दे रहा था जिसे बदलने के लिए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मार्य का भी रोड शो कराया गया परंतु भाजपा को उसका लाभ नहीं मिल सका। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही ब्राम्हण प्रत्याशी मैदान में उतारे थे इसलिए ब्राम्हण मतदाताओं के मतों का भी विभाजन हो गया परंतु कांगे्रस लाभ में रही। भाजपा ने यदि सुरेन्द्र सिंह गहिरवार को प्रत्याशी बनाने का फैसला किया होता तो हार का अंतर कम हो सकता था। शीतला प्रसाद त्रिपाठी को भाजपा प्रत्याशी बनाए जाने से क्षत्रिय मतदाता नाराज हो गए। एक के बाद एक कारण जुड़ते चले गए और भाजपा की हार सुनिश्चित होती चली गई।

चित्रकूट में भाजपा हार की समीक्षा के बाद पार्टी किस नतीजे पर पहुंचती है यह तो पार्टी ही जाने परंतु 2018 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में 200 का आंकड़ा पार कर लेने की महत्वाकांक्षा पाले बैठी सत्ताधारी पार्टी को अब इस ङ्क्षबदु पर विचार करने के लिए भी विवश होना पड़ेगा कि अकेले चित्रकूट में ही पार्टी व सरकार की सारी ताकत झोंक देने के बावजूद अगर यह सीट कांग्रेस के कब्जे से छीनने में उसे सफलता नहीं मिली तो 2018 में वह 200 का आंकड़ा पार करने का उसका दावा क्या अतिरंजित माना जाएगा। अकेले चित्रकूट में पार्टी और सरकार ने जिस तरह अपनी सारी ताकत झोंक दी थी उस तरह  2018 के विधानसभा चुनावों में तो हर विधानसभा क्षेत्र में वह अपने प्रत्याशी की जीत की कल्पना कैसे कर पाएगी।

चित्रकूट में कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी की शानदार जीत ने राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता अजय सिंह का कद निश्चित रूप से ऊंचा कर दिया है। प्रत्याशी चयन से लेकर उसकी विजय को सुनिश्चित बनाने की रणनीति तैयार करने में अजय सिंह की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही। कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव तो नीलांशु चतुर्वेदी ने लड़ा परंतु उनकी जीत अगर अजय सिंह की जीत के रूप में परिभाषित की जाए तो अनुचित नहीं होगा। अब देखना यह है कि मुंगावली और कोलारस विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनावों में कांग्रेस का उत्साह क्या रंग दिखाता है।

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