सोनारी का काम लोहारों के हाथ में : अविमुक्तेश्वरानन्दः

काशी (सुदीप्तो चटर्जी “खबरीलाल”) :- सोनारी अर्थात् सोने का कार्य । जिसे सोनार भाई करते हैं । सोनारी काम की विशेषता यह है कि इस काम को बड़े धैर्य से धीरे धीरे करना होता है । सोने का एक कण भी व्यर्थ किये बिना सोने में नक्काशी करना । यह सोनारी काम की विशेषता है । इसलिए सोनार छोटी छोटी हथौड़ी आदि औजारों के साथ काम करते हैं । वहीं लोहे का काम करने वाले लोहार अपने हाथ में वज़नदार हथौड़ा या घन रखते हैं । और बेपरवाही से चोट करते हैं ।यह अन्तर इसीलिए आता है क्योंकि सोना और लोहा इन दोनों धातुओं के मूल्य में बड़ा अन्तर होता है । काशी और अन्य कोई नगर एक से नहीं हैं । काशी सोना है । पर आज काशी में जो हो रहा है वह लोहारी जैसा है ।इसका परिणाम यह है कि काशी की मूल्यवान धरोहरें, जीवन्त स्थापत्य और काशी की पहचान आदि सब के सब खतरे में पड़ गये हैं ।उक्त उद्गार मन्दिर बचाओ आन्दोलनम् के अन्तर्गत अपने सहयोगियों सहित काशी की नंगे पाँव पदयात्रा कर रहे स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ने यात्रा के पांचवे दिन के पड़ाव जैतपुरा के नागकूप पर आयोजित सभा में कहीं । उन्होंने आगे कहा कि हाँ, काशी पुरानी है । पर पुरानी चीजों का अपना महत्व होता है । आजकल उस महत्व को एन्टीक वेल्यू के रूप में कहा जाता है । विचार करिये कि कहीं नये के व्यामोह में हम अपने इस एन्टीक वेल्यू वाले नगर को खो तो नहीं रहे हैं ? यदि किसी के मन में नयेपन की अभिलाषा है तो वह भी गलत नहीं है । पर बहुत से लोग पुराने को भी पसन्द करते हैं । तो पुराने को बनाये रखते हुये नये का निर्माण स्वागत योग्य हो सकता है । ऐसे लोगों को नई काशी का निर्माण करना चाहिए । वे नई काशी को जितना चाहें सुन्दर बना सकते हैं ।

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