नारायणपुरः भीतर के गांव तुरठा स्कूल का कायाकल्प : शिक्षा के साथ बच्चों को मिलने लगा मित्रतापूर्ण वातावरण

लेख – शशिरत्न पाराशर
सहायक संचालक, जनसंपर्क


नारायणपुर देश के आंकाक्षी जिलों में शामिल नारायणपुर में शिक्षा के गुणवत्ता पर चिंता व्यक्त की गई। यहां की शिक्षा की गुणवत्ता विभिन्न मानकों पर काफी पिछ़डी हुई है। जैसे पहली कक्षा से तीसरी कक्षा के ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूली बच्चों में हिन्दी और गणित विषयों पर समझ काफी कमजोर पाया गया है। इसके साथ ही आठवीं कक्षा के बच्चे चौथी पांचवीं कक्षा का पाठ भी नहीं पढ़ पाते है। सरकारी स्कूलों में बच्चों के प्रवेश में भी कमी देखने को मिल रही है। इससे चिन्ता पैदा होना स्वभाविक है। यह चिंताए खासतौर पर इसलिए भी हैं क्यांेकि सरकारी स्कूलों में अधिकांश बच्चे आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के अध्ययनरत है। सबसे अधिक ध्यान हमें सरकारी स्कूलों पर ही देना होगा। खासतौर पर अन्दर के ग्रामीण क्षेत्रों की शालाओं में ।
अभी हाल ही में षिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर करने और सुधारने के लिए लोक शिक्षण संचालक श्री एस. प्रकाश ने स्कूल षिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ जिला अधिकारियों की बैठक लेकर कुछ जरूरी टिप्स दिए। कलेक्टर श्री पी.एस. एल्मा भी स्कूलों की शिक्षा गुणवत्ता के साथ ही स्कूलों की कायाकल्प के लिए छह माह की कार्य योजना बनाकर कार्य कर रहे है। इसके अब सकारात्मक परिणाम नजर आने लगे है। ग्रामीणजन के साथ ही शिक्षक भी बच्चों की शिक्षा गुणवत्ता में सुधार के साथ ही स्कूलों के कायाकल्प करने में जुट गए है। अविभावकों का भी अब पूरा सहयोग मिलने लगा है। नक्सल प्रभावित जिला होने के बावजूद गांव तुरठा में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का कायाकल्प किया जा रहा है। स्कूल के प्रधानाध्यापक श्री पुजारी इस काम के लिए अपने वेतन से प्रतिमाह एक हजार रूपए खर्च कर इस काम को सुखद अंजाम दे रहे है। उनका कहना है कि स्कूल के बच्चें उनके अपने बच्चें है। अगर उनके लिए कुछ कर दिया तो कोई एहसान नहीं किया। वाकई ऐसा अगर शिक्षक अपनी जिम्मेदारी निभाये तो वह दिन दूर नहीं जब यह नक्सल प्रभावित जिला भी शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाई हासिल कर लेगा।
शिक्षकों के व्यक्तिगत प्रयासों से शाला मे बच्चों के लिए षिक्षा के साथ मित्रतापूर्ण वातावरण तैयार किया जा रहा है। शाला में आकर्षक रंगाई पुताई के साथ ही कलात्मक पेंटिंग-चित्र उकेरे गए है। अन्दर बच्चों को बैठने के लिए ग्रीन कारपेट बिछाया गया है। इस गांव को जल्द नई पहचान मिलेगी, यह महज कुछ उदाहरण है, पर इनकी सख्या बहुत कम है। ऐसे स्कूलों से बच्चों में प्रवेश की संख्या में इजाफा होगा वही अभिभवकों में भी बच्चों को पढ़ाने और दाखिले कराने की होड़ मचेगी। जिला प्रशासन भी इन कारणों पर विचार कर रहा है, कि क्या वजह है कि शिक्षक अपने मुख्य काम यानि अध्यापन पर सबसे कम ध्यान दे पा रहे हैं। उन्हें भी स्कूलों में बच्चों के साथ अच्छा वातावरण मिले। इस पर काम किया जा रहा है।

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