एनआईए एक्ट के मामले में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने के छत्तीसगढ़ सरकार के निर्णय का कांग्रेस ने किया स्वागत

गंभीर संवैधानिक विषय के साथ-साथ संवेदना और जनहित से जुड़ा मामला

रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा एनआईए के क्षेत्राधिकार को चुनौती देने वाली याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर किये जाने का स्वागत करते हुये प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री एवं संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा है कि यह मामला गंभीर संवैधानिक विषयों के साथ-साथ संवेदना एवं जनहित से जुड़ा विषय भी है। यह मामला केंद्र सरकार के द्वारा लगातार संघीय अवधारणा के खिलाफ काम करने से जुड़ा हुआ है। इस मामले में गंभीरता से विचार करने के बाद इस याचिका की आवश्यकता पड़ी है ताकि राज्यों के अधिकारों पर एनआईए एक्ट की आड़ लेकर जो अतिक्रमण केंद्र सरकार के द्वारा किया जा रहा है भविष्य में न किया जा सके।

प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री एवं संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा है कि जीरम मामले में एनआईए को जब जांच सौंपी गई थी उस समय राज्य सरकार के भाजपा सरकार के नोडल अफसरों ने लगातार जांच में बाधाये डाली और जब केंद्र में मोदी सरकार बनी तो जांच की दिशा ही बदल गई। हमने 2018 का विधानसभा चुनाव जीरम के जांच के मुद्दे पर लड़ा था। शहीदों के परिजन चाहते है कि मामले की जांच हो। राज्य के मतदाता चाहते है कि जीरम मामले की जाँच हो। कांग्रेस को जनादेश मिला है। लेकिन एनआईए के द्वारा फाइल नही दी जा रही है, वो भी तब जब कानून व्यवस्था राज्य का विषय है। अगर कोई जांच होती है तो राज्य सरकार की अनुशंसा पर होनी चाहिए। राज्य सरकार की अनुमति से होना चाहिए। राज्य सरकार की सहमति से होना चाहिए। राज्य सरकार के संज्ञान में होना चाहिए। लेकिन एनआईए के द्वारा ऐसा नही किया गया और इस परिप्रेक्ष्य में राज्य और राज्य की जनता के व्यापक हित में कांग्रेस की सरकार ने इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय जाने का फैसला लिया है।

31 दिसंबर 2008 को भारत के संसद द्वारा पारित अधिनियम राष्ट्रीय जांच एजेंसी (छप्।)विधेयक 2008 के लागू होने के साथ ही आया था। मुंबई हमले के पश्चात एनआईए को स्थापित किया गया था। 2008 से 2013 तक एनआईए के अनुसार सांख्यिकी लगभग 90 प्रतिशत था। लेकिन इसके बाद इसमे जो एनडीए सरकार ने जो संसोधन किया और जो इस देश के संघीय ढांचे को तोड़ने एवं मड़ोने एवं दबाव बनाने के उदेश्य से जो संसोधन किये गये। उसके बाद से यह सर्वविधित है कि एनआईए का उपयोग केवल राजनैतिक उदेश्य के पूर्ति के लिए केन्द्र सरकार के उपयोग के लाया जा रहा है। ये हमारे संघीय ढ़ाचा को तहस नहस करने के लिए योजना बत तरीके से केन्द्र सरकार राज्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए और अपने गलत उदेश्यों की पूर्ति के लिए इसमें संसोधन किये गये।

राज्य की सुरक्षा का अधिकार पूरी तरीके से राज्य सरकार का होता है। लेकिन एनआईए के संशोधित विधेयक के अनुसार एनआईए जब चाहेगी बिना राज्य के अनुमति के वो जिसे चाहेगी उससे पूछताछ कर सकेगी,उसे गिरफतार कर सकेगी। वो जिस कोर्ट को उसको वो स्पेशल कोर्ट बना सकेगी या मानेगी।

एनआईए विदेशों में भी जांच कर सकेगी। (किसी भी देश में एनआईए कैसे जांच कर पायेगी जबकि उस देश का कानून लागू होता है। दो देशों के बीच हमेशा इन सारे विषयों को लेकर समझौता होता है। ये स्पष्ट नही बताया गया है कि विदेशी धरती पर एनआईए कार्य करेगी और उसका कार्यक्षेत्र कैसा होगा।)

पहले जो 2008 में एनआईए कानून बना था उस समय यूपीए सरकार थी और एनआईए का सफलता का आंकड़ा लगभग 90 प्रतिशत था। लेकिन 2014 से अभी तक एनआईए से लोगों का विश्वास उठा है। जिसके बहुत से उदारण देखने को मिले है जिसमें झीरम मामलें सहित मालेगांव केस में प्रज्ञा ठाकुर और उनके साथियो को बाहर लाने के लिए अपील ना करना। मक्का मजिस्द ब्लास्ट, झीरम कांड में एनआईए द्वारा संयत्र को मानकर जांच न करना। भीमा मंडावी केस में अभी तक कुछ ना होना ये कही ना कही ये संस्था पर प्रश्न चिन्ह करता है इस कारण छत्तीसगढ़ सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और अपनी याचिका में कहा है कि एनआईए कानून 2008 को असंवैधानिक घोषित करते हुये यह मांग की यह कानून केन्द्र सरकार की मनमानी का अधिकार देता है। इस लिहाज से छत्तीसगढ़ में किसी भी जांच के अधिकार एनआईए को नही दिया जाये।

भारत में आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए पहले भी केन्द्र सरकार द्वारा 1985 में राजीव गांधी द्वारा टाडा लाया गया था 1983 में नरसिम्हा राव द्वारा भी कानून लाया गया था। 2001 में अटल बिहारी जी द्वारा पोटा कानून लाया गया था। और 2008 में यूपीए सरकार ने एनआईए लाया गया था लेकिन इसे राज्य सरकार के कानून से अलग रखा गया था। और पूरी तरीके से केन्द्र सरकार इसे अपने अधिकार क्षेत्र में रखकर कार्य किया करती थी और संघीय ढाचे में हमारे देश में केन्द्रीय आतंकवाद विरोधी कानून परिवर्तन एजेंसी के रूप में काम करती है आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए वह आतंकवादियों को धन उपल्बध कराने एवं अन्य आतंक संबधी जैसे साइबर अटैक, मानव तस्करी, आतंकवादी घटना, किसी हथियार को बना या उसे बेचना जो देश में प्रतिबंद्व हो इसकी जांच हो सके। ये उदेश्य एनआईए बनाने का था। जबकि सीबीआई आतंकवाद को छोड़कर, भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराध एवं गंभीर अपराध का अन्वेष्ण करती है।

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