स्मृति शेष श्री अनिल माधव दवे
कृष्णमोहन झा
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

अचानक सुबह ट्वीटर के नोटिफिकेशन पर नजर गई, मोदी जी का ट्वीट दवे जी के निधन पर ,कुछ देर तक मुझे विश्वास ही नही हुआ की ऐसा कुछ सत्य हो सकता है 10 मिनट पहले ही तो मोदी जी का ट्वीट देखा था जिसमे उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के सहयोगी श्री थावर चंद जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं दी थी। संयोग ऐसा की आज मां नर्मदा के तट पर स्नान के बाद मोबाईल उठाने पर नर्मदा भक्त के निधन की खबर, यह मैं कहूं तो अतिशयोक्ति नही होगा की मेरे लिए यह व्यक्तिगत क्षति है। एक सप्ताह पहले ही तो मैने उनसे अपनी अगली कृति मास्टर स्ट्रोक की भूमिका लिखने का आग्रह किया था ,पहले तो उन्होंने अपनी व्यस्तता की बात कही,एक दो और नाम सुझाये लेकिन मेरे आग्रह को उन्होंने अंत में स्वीकार करते हुए कहा था कि जून के प्रथम सप्ताह बाद इस कार्य को अंतिम रूप देंगे। अनायास ही मुझे बार बार उनका मुस्कराता चेहरा नजर आता है, जब भी मेरी बात उनसे होती हमेशा यही कहता आप राजनेता तो लगते ही नही है,हमेशा उनका एक ही जवाब रहता मैं एक स्वयं सेवक हूं।

पहले जब मैं चैनल नंबर 1 में था तब कई बार दवे जी से मुलाकात हुई,कई बार चुनाव की तैयारी को लेकर साक्षात्कार भी लिया पर निकटता हुई रमेश शर्मा भाईसाहब की वजह से। भाईसाहब ने जब दवे जी से मुलाकात करवाई तो हम तीनों ने साथ में नास्ता किया। राजनैतिक विषयों के साथ साथ पर्यावरण और मां नर्मदा के बारे में भी चर्चा हुई,नर्मदा जी से उन्हें विशेष लगाव रहा है। उन्होंने बताया कि मैंने नर्मदा जी के घाटों में चेंजिंग रूम भी बनवाया है। अमरकंटक से लेकर जबलपुर में ये चेंजिग रुम बनाये गए है, नदी महोत्सव के माध्यम से हमने लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया हैं, मां नर्मदा के तटों पर उनके द्वारा लगाई गई चौपाल मैंने स्वयं देखी है ,इस चौपाल के प्रति लोगों में भारी उत्साह देखने को मिलता था, एक बार मां नर्मदा लंबे समय से हो रही है राजनीति का शिकार विषय पर प्रकाशित लेख पर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि मुझे कोई चुनाव तो लडऩा नहीं है जो मैं मां के नाम पर राजनीति करूंगा। एक बात और महत्वपूर्ण है जिसका उल्लेख आवश्यक है वह यह कि जब उनके कार्यालय से मेल आता था तो हमेशा यह लिखा होता था कि पर्यावरण की सुरक्षा के लिये मेल का प्रिंट तब तक न निकाले जब तक अत्यंत आवश्यक ना हो। पर्यावरण को लेकर इतना गंभीर चिंतन तो देखने को आज तक नहीं मिला मुझे। दवे जी ने एक संकल्प पत्र जिसे मीडिया वसियत कह रहा है इसमें दवे जी ने लिखा है कि मेरा अंतिम संस्कार नर्मदा के तट पर किया जाये और किसी भी प्रकार के आडम्बर की आवश्यकता नहीं है, इतना ही नहीं उन्होंने यह भी लिखा है कि मेरी कोई प्रतिमा नहीं लगाई जाएं और ना ही मेरे नाम पर कोई प्रतियोगिता और पुरुस्कार भी नहीं दिया जाए। पूरा जीवन राष्ट्र सेवा और पर्यावरण की सुरक्षा में समर्पित करने वाले अनिल दवे जी वर्तमान समाज के सामने जो आदर्श प्रस्तुत किया है वह अनुकरणीय है। दवे जी ने किताबें भी लिखी थी उनमें सृजन से विसर्जन तक, नर्मदा समग्र, शताब्दी के पांच काले पन्ने (सन् 1900 से सन् 2000), संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से, महानायक चंद्रशेखर आजाद, रोटी और कमल की कहानी, समग्र ग्रामविकास, अमरकंटक से अमरकंटक तक चर्चित किताबें है।

नरेन्द्र मोदी की टीम के एक सशक्त साथी माने जाते रहे अनिल माधव दवे प्रतिभा के धनी थे। वे साहित्यकार और प्रोफेशनल पायलट तो थे ही साथ ही साथ उन्हें बंदूक चलाने का भी काफी शौक था। उनके पास 50 हजार रुपए कीमत की पुरानी पिस्टल और 20 हजार रुपए मूल्य की राइफल थी। दवे जी की प्रारंभिक शिक्षा रेलवे में कार्यरत पिता के साथ गुजरात के विभिन्न अंचलों में हुई थी। 1964 से रा.स्व. संघ के स्वयंसेवक बने इसके बाद इंदौर के गुजराती कॉलेज से एम कॉम किया। इस बीच वे छात्र संघ के अध्यक्ष भी रहे। ग्राम्य अर्थव्यवस्था व प्रबंधन में विशेषज्ञता रखने वाले दवे जन अभियान परिषद् (स्वयंसेवी संगठनों के दर्शन और व्यवहार को क्रियारूप देने का प्रयास करने वाली मप्र की संस्था) के रचनाकार रहे हैं। अनिल दवे जी ने नर्मदा नदी के लेकर एक बड़ी मुहिम चलाई थी। नदी और पर्यावरण से उनका लगाव ऐसा था कि उन्होंने भोपाल स्थित अपने घर का नाम भी नदी का घर रख दिया। उनका घर अब एक संग्राहलय का रूप ले चुका है। दवे जी ने शादी नहीं की थी।

लगातार मेरे सामने उनका मुस्कराता चेहरा नजर आ रहा है लिखने को बहुत है पर अभी शब्द कम पड़ रहे है,उनको चाहने वालों की कमी नहीं है फेसबुक पर लगातार दवे जी के बारे में लिखा जा रहा है इस समय मैं केवल इतना कहना चाह रहा हूँ कि राजनैतिक नौटंकियों और आडंबरों से दूर रह कर राजनीति करने वाले नर्मदा भक्त राजनेताओं की नई पीढ़ी के लिए एक आदर्श स्थापित कर गए।

‘बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्ही सो गए दास्तां कहते-कहते’

इन पंक्तियों के साथ शत शत नमन….