कृष्णमोहन झा

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद राज्य में सत्तारूढ़ दल आल इंडिया अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कषगम के अंदर जो उठापटक का दौर प्रारंभ हुआ था उस पर विराम लगता नजर आ रहा है। दिवंगत मुख्यमंत्री की सर्वाधिक विश्वस्त होने का दम भरने वाली उनकी सहेली शशिकला नटराजन को जब भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल की सजा सुना दी गई तब अपने जिन विश्वास पात्र पार्टी नेता पलानी सामी को उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया था वे अब मुख्यमंत्री की कुर्सी छोडक़र पार्टी के महासचिव पद की बागडोर थामने के लिए तैयार हो चुके हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अब जल्दी ही ओ पन्नीर सल्वम बैठे दिखाई देंगे। पन्नीर सेल्वम को हटाकर ही पलानी सामी मुख्यमंत्री बने थे परंतु उनके विरूद्ध पार्टी विधायक दल के अंदर असंतोष पनपने की खबरें भी जल्दी ही आने लगी तो ऐसा प्रतीत होने लगा था कि अन्नाद्रमुक का विधिवत विभाजन अब अवश्यंभावी है। अन्नाद्रमुक के दो फाड़ होने की संभावनाओं से राज्य के अनेक राजनीतक दलों को अपना भविष्य सुनहरा दिखाई देने लगा था परंतु अन्नाद्रमुक के दोनों धड़ों में अब सुलह की संभावनाएं इतनी बलवती दिखाई देने लगी है कि राज्य में सत्ता के नजदीक पहुंचने की उम्मीद लगाए बैठे राजनीतिक दलों के पास जयललिता के समान लोकप्रिय नेता का अभाव हो परंतु अन्नाद्रमुक में विभाजन की संभावनाओं से उन्हें अपनी राह आसान प्रतीत होने लगी थी। इसी स्थ्ािित का अनुमान लगाकर अन्ना्रदमुक के दोनों धड़ों ने आपस में समझौता करने में ही पार्टी की भलाई देखी और सत्ता तथा संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने समझौते के बिन्दुओं पर विचार करना शुरू कर दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भी इस कड़वी सच्चाई को भांप लिया कि अगर पार्टी में विभाजन हो गया तो आगे चलकर उसके पास सत्ता भी नहीं रहेगी और दोनों धड़ों के पास जयललिता जैसा कश्मिाई नेता भी नहीं है जो अपनी जादुई लोकप्रियता के बल पर पार्टी को पुन: सत्ता की चौखट पर पहुंचा सके। इसलिए पूर्व मुख्यमंत्री ओ पन्नीर सेल्वम तथा वर्तमान मुख्यमंत्री पलानी सामी समझौते की टेबिल पर आने के लिए राजी हो गए। पलानी सामी को भी यह एहसास हो चुका था कि विधायक दल के अंदर उनके विरूद्ध असंतोष की आशंका आगे भी बनी रहेगी और एक न एक दिन पन्नीर सेल्वम को मुख्यमंत्री बनाने की मांग अवश्य उठेगी इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी त्यागकर महासचिव बनने के प्रस्ताव पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी। पलानी सामी के पास यद्यपि 234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा में 122 विधायकों का बहुमत है परंतु पिछले दिनों इनमें कुछ विधायक पूर्व महासचिव शशिकला नटराजन दिनाकर के खिलाफ लामबंद हो चुके है। उनका मानना है कि शशिकला और दिनाकर के कारण पार्टी की छवि धुमिल हो रही है। शशिकला को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल की सजा सुना दी गई है और दिनाकरण के खिलाफ यह आरोप है कि उन्होंने दो पत्ती चुनाव चिन्ह हासिल करने के लिए चुनाव अधिकारियों को घूस देने की कोशिश की थी। दिल्ली पुलिस ने दिनाकरण के खिलाफ चुनाव आयोग के अधिकारियों को एक बिचौलिए सुकेश चन्द्रशेखर के जरिए कथित तौर पर रिश्वत देने का प्रकरण दर्ज किया है। इसी मामले में दिनाकरण दिल्ली पुलिस के सामने पूछताछ के लिए पेश भी हो चुके है। दिनाकरण जेल की सजा काट रही शशिकला के भतीजे है। सुलह फार्मूले के अनुसार अगर पन्नीर सेल्वम को पुन: मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने का मौका मिलता है तो वे आगे चलकर स्वयं को जयललिता का वास्तविक उत्तराधिकारी साबित करने के लिए कोई कसर नहीं रख छोड़ेंगे और जनता भी उन्हें इस रूप स्वीकार करने के लिए तैयार हो सकती है। पन्नीर सेल्वम पहले भी जयललिता के स्थान पर कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं। जयललिता के हाथों में जब भी मुख्यमंत्री पद की बागडोर आई तब पन्नीर सेल्वम उनके सर्वाधिक विश्वास पात्र मंत्री माने जाते थे। पन्नीर सेल्वम के मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में राज्यमंत्रिमंडल में भी फेरबदल होना तय माना जा रहा है।

पन्नीर सेल्वम के हाथों में अगर मुख्यमंत्री पद की बागडोर आती है तो वे उनकी सरकार में वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री विजय भास्कर को जगह मिलना मुश्किल है। पन्नीर सेल्वम साफ सुथरी छवि वाले मंत्रियों को अपनी सरकार में शामिल करेंगे और उस कसौटी पर विजय भास्कर खरे नहीं उतरते। गौरतलब है कि पिछले दिनों आयकर विभाग की टीम ने विजय भास्कर के निवास पर छापा माारा था।

आगे चलकर यह भी उत्सुकता का विषय होगा कि पार्टी में दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता की भतीजी दीपा जयकुमार को कोई जिम्मेदारी सौंपी जाती है अथवा नहीं। जयललिता दीपा को बहुत अधिक स्नेह करती थी और जयललिता के निधन के बाद दीपा ने शशिकला नटराजन के इस दावे का खंडन किया था कि जयललिता उन्हें अपनी राजनीतिक विरासत सौंपकर गई हैं। शशिकला नटराजन ने ही दीपा जयकुमार को उभरने का मौका नहीं दिया और वे चर्चा से गायब हो गई। अब देखना यह है कि अगर दीपा जयकुमार राजनीति में प्रवेश करने का फैसला करती है तो उन्हें पार्टी में कौन सी भूमिका प्रदान की जाती है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दीपा जयकुमार फिलहाल तो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं है।