लखनऊ: चित्रकूट के जंगल में डाकू ललित पटेल ने सोमवार को देर रात तीन बंधकों को जिंदा जला दिया. उन्हें मध्य प्रदेश से अगवा किया गया था. डाकू की तलाश में पुलिस कॉम्बिंग कर रही है लेकिन उसका कहीं पता नहीं है. चंद दिनों पहले बांदा में पुलिस के एक शहीद स्मारक को भी डाकू तोड़ चुके हैं. यूपी-एमपी की सरहद पर इन इलाकों में डाकुओं का आतंक है. यहा पर वे अपराध की रोज नई कहानी लिख रहे हैं.

चित्रकूट के कोल्हुआ के जंगल में ताजा जले हुए तीन नरकंकाल मिलने से दहशत फैल गई है. खबर लगते ही मौके पर पुलिस पहुंची. इलाके के डरे हुए लोग दबी ज़ुबान में कहते हैं कि मध्य प्रदेश का इनामी डाकू ललित पटेल और उसकी गैंग वहां से गुजरी थी. शक है कि सतना के नया गांव से जिन तीन लोगों को डाकू ने 30 मई को अगवा किया था, फिरौती न मिलने पर उन्हें ही जला डाला है.

जंगल में मौका मुआयना के लिए पहुंचे बांदा के डीआईजी ज्ञानेश्वर तिवारी कहते हैं कि, ”हो सकता है कि इन्हें कहीं और मारा गया हो और यहां लाकर एक साथ जला दिया गया हो. अब इसके बारे में पूरी तहकीकात की जा रही है. जो भी यहां एविडेंस मिले उनको कलेक्ट किया गया है. स्कल कलेक्ट किया गया है. डीएनए सैंपलिंग कराई जाएगी और जो लोग गायब हैं उनके परिवार वालों के डीएनए परीक्षण कराए जाएंगे. फिर उससे कनेक्ट किया जाएगा.”

यूपी-एमपी सरहद के इन जंगलों में डाकुओं की आमदरफ्त काफी बढ़ गई है. इन इलाकों पर लंबे अरसे तक डाकुओं की हुकूमत रही है. लोगों को अगवा कर फिरौती वसूलना और सारे सरकारी ठेकों में कट लेना इनका पेशा है. इसी इलाके के सबसे बड़े डाकू ददुआ ने यहां 35 साल राज किया. यहां की 10 असेंबली सीटों पर उसका फरमान चलता था. चुनाव के वक्त जिसके लिए उसका फरमान जारी होता अवाम को उसे वोट देना पड़ता.

लेकिन यहां डाकुओं के खिलाफ चले अभियान में एक-एक कर तमाम बड़े डाकू मारे गए. सन 2007 में सात लाख का इनामी डाकू ददुआ मारा गया था. वर्ष 2008 में पांच लाख का इनामी डाकू ठोकिया मारा गया था. साल 2012 में दो लाख का इनामी डाकू रागीया मारा गया और 2015 में पांच लाख का इनामी डाकू बलखड़िया मारा गया. लेकिन अब फिर डाकुओं की तीन गैंग यहां सक्रिय हो गई हैं. यह गैंगें अक्सर रातों में जंगल में बारिश होने पर गावों में पनाह लेने आती हैं. गांव वालों को पूरी गैंग को खाना खिलाना पड़ता है.

चित्रकूट के कोल्हुआ के जंगल के पास रहने वाले रामेश्वर कहते हैं कि, “अरे साहब पूछो न.. रात को खेत ही नहीं जाते हैं. फसल जानवर चर जाते हैं..घर के किवाड़ बंद करके पड़े रहते हैं. और अगर रात को डाकू रहने आ जाएं तो मुसीबत ही है. उनको पनाह देने से मना करो तो डाकू की गोली खाओ और अगर पनाह दो तो फिर पुलिस के निशाने पर आ जाओ. गांव वालों की बड़ी मुसीबत है.”

इन्हीं इलाकों में सन 2007 में डाकू ठोकिया की गैंग ने उसकी तलाश में जुटी एसटीएफ के छह जवानों को भून डाला था. उनकी याद में बने शहीद स्मारक पर चंद दिनों पहले एक लाख के इनामी डाकू रामगोपाल उर्फ गोप्पा ने हमला किया. माना जा रहा है कि पुलिस का शहीद स्मारक तोड़कर उसने सीधे पुलिस को चुनौती दी है. इससे इलाके में दहशत है.

बांदा के डीआईजी ज्ञानेश्वर तिवारी कहते हैं कि, “हमने इसे बहुत गंभीरता से लिया है. यह काम गोप्पा गैंग का है. यह गौरी यादव गैंग से ही निकली हुई एक गोपा यादव गैंग है. यह तीन गैंग इस वक्त यहां सक्रिय हैं जिनके लिए पुलिस लगातार कॉम्बिंग कर रही है. पिछले एक महीने में तीन-चार मुठभेड़ हो चुकी हैं. आमने-सामने गोलियां चल चुकी हैं और इसमें पूरी तरह से पुलिस सक्रिय है. उम्मीद है कि जल्द उन्हें पकड़ लेंगे.”

घने जंगलों से घिरे इस इलाके की भौगोलिक स्थिति डाकुओं को एक बेहतरीन पनाहगाह देती है. लेकिन बारिश में उन्हें जंगल से निकलकर गावों में पनाह लेना पड़ती है. पुलिस उन्हें खत्म करने के लिए ऐसे ही मौके की तलाश में है.

(साभार : NDTV इंडिया )