आडवाणीनई दिल्ली : दोषी ठहराए गए सांसदों और विधायकों के चुनाव लड़ने पर आजीवन बैन के मसले पर चुनाव आयोग को चुप्पी के कारण सुप्रीम कोर्ट की फटकार झेलनी पड़ी है। बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इस मसले पर चुप्पी के लिए आयोग के रवैये पर नाराजगी जताई। अदालत ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि क्या उसका यह स्टैंड केंद्र सरकार के दबाव के चलते है। सरकार ने दोषी ठहराए गए नेताओं को चुनाव लड़ने से आजीवन प्रतिबंधित करने का विरोध किया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग के स्वायत्त संस्था होने के दावे पर भी सवाल खड़ा किया।

जस्टिस रंजन गोगोई और नवीन सिन्हा की पीठ ने चुनाव आयोग की ओर से जमा कराए गए ऐफिडेविट को पढ़ते हुए कहा कि उसका यह शपथपत्र याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्यय की चिंता को ही उजागर करता है। अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे नेताओं के केसों की तेज सुनवाई के लिए स्पेशल अदालतें गठित करने की मांग की है। उपाध्याय की याचिका के मुताबिक, ‘अपराधी साबित हुए नेताओं को विधायिका, कार्यपालिका के अलावा न्यायिक क्षेत्र से भी पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।’

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आयोग की ओर से पेश हुए अधिवक्ता मोहित राम से पूछा कि क्या इलेक्शन कमिशन इस याचिका का समर्थन करता है, जिसमें आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए नेताओं के आजीवन चुनाव लड़ने पर बैन की मांग की है। इस पर मोहित राम ने कहा, ‘हम राजनीतिक क्षेत्र से अपराध को खत्म किए जाने का समर्थन करते हैं। लेकिन, आजीवन प्रतिबंध को लेकर हमारी कोई राय नहीं है।’ चुनाव आयोग की ओर से कोई ठोस जवाब न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, ‘जब वोटर खुद सुप्रीम कोर्ट के पास आपराधिक छवि वाले नेताओं पर आजीवन बैन की मांग करते हुए आ रहे हैं तो क्या चुनाव आयोग चुप्पी साध सकता है।’

इस मसले पर केंद्र की ओर से सौंपे गए ऐफिडेविट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट दोषी ठहराए गए नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन बैन नहीं लगा सकता है। फिलहाल जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत आपराधिक मामले में दोषी ठहराए गए नेताओं के जेल से निकलने के बाद 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक का प्रावधान है।