रायपुर : डॉ.अनय चंद्राकर जोकि विश्व के सबसे सुप्रसिद्ध संस्थान kottakkal arya vaidyasala,केरल से अनुभव प्राप्त करके शहर रायपुर में पिछले 3 वर्षों से श्री आयुर्वेद में पंचकर्म के माध्यम से बहुत से रोगों का निवारण कर रहे हैं ! जैसे – मानसिक रोग,लकवा,आर्थराइटिस,पेट सम्बंधी विकार,किसी भी प्रकार का दर्द,स्त्रीरोग आदि सभी प्रकार के रोग !

पंचकर्म क्या हैं ?

पंचकर्म (अर्थात पाँच कर्म) आयुर्वेद की विशिष्‍ट चिकित्‍सा पद्धति कहते है। इस विधि से शरीर में होंनें वाले रोगों और रोग के कारणों को दूर करनें के लिये और तीनों दोषों (अर्थात त्रिदोष) वात, पित्‍त, कफ के असम रूप को समरूप में पुनः स्‍थापित करनें के लिये विभिन्‍न प्रकार की प्रक्रियायें प्रयोग मे लाई जाती हैं। लेकिन इन कई प्रक्रियायों में पांच कर्म मुख्‍य हैं, इसीलिये ‘’पंचकर्म’’ कहते हैं। ये पांच कर्मों की प्रक्रियायें इस प्रकार हैं-

  1. वमन
  2. विरेचन
  3. बस्ति – अनुवासन
  4. बस्ति – आस्‍थापन
  5. नस्य

पंचकर्म, आयुर्वेद शास्त्र में वर्णित एक विशेष चिकित्सा पद्धति है, जो दोषों को शरीर से बाहर निकाल कर रोगों को जड़ से समाप्त करती है। यह शरीर शोधन की प्रक्रिया है, जो स्वस्थ मनुष्य के लिए भी फायदेमंद है।अगर आप आयुर्वेद को अपनाते हैं तो बिना किसी रोग के 100 वर्षों से अधिक जीवन यापन कर सकते हैं!

वमन

उर्ध्व मार्ग से दोषों का निर्हरण वमन कहलाता है। अर्थात उल्टी करा कर मुख द्वारा दोषों का निकालना वमन कहलाता है। वमन को कफ दोष की प्रधान चिकित्सा कहा गया है।

वमन योग्य रोग- श्वास, कास, प्रमेह, पांडु रोग (एनीमिया), मुख रोग अर्बुद आदि।

वमन के अयोग्य रोगी- गर्भवती स्त्री, कोमल प्रकृति वाले व्यक्ति, अतिकृश भूख से पीड़ित आदि।

विरेचन

गुदामार्ग मलमार्ग से दोषों का निकालना विरेचन कहलाता है। विरेचन को पित्त दोष की प्रधान चिकित्सा कहा जाता है।

विरेचन योग्य रोग- शिरः शूल, अग्निदग्ध, अर्श, भगंदर, गुल्म, रक्त पित्त आदि।

विरेचन के अयोग्य रोगी- नव ज्वर, रात्रि जागरित, राजयक्ष्मा आदि।

वस्ति

  1. आस्थापन वस्ति,
  2. अनुवासन वस्ति

वस्ति वह क्रिया है, जिसमें गुदमार्ग, मूत्रमार्ग, अपत्यमार्ग, व्रण मुख आदि से औषधि युक्त विभिन्ना द्रव पदार्थों को शरीर में प्रवेश कराया जाता है।

मूत्र मार्ग तथा अपत्य मार्ग से दी जाने वाली वस्ति उत्तर वस्ति कहलाती है तथा व्रण मुख (घाव के मुख) से दी जाने वाली वस्ति व्रण वस्ति कहलाती है। वस्ति को वात रोगों की प्रधान चिकित्सा कहा गया है। आस्थापन वस्ति में विभिन्न औषधि द्रव्यों के क्वाथ (काढ़े) का प्रयोग किया जाता है। अनुवासन वस्ति में विभिन्न औषधि द्रव्यों से सिद्ध स्नेह का प्रयोग किया जाता है।

वस्ति के योग्य रोग- अंग सुप्ति, जोड़ों के रोग, शुक्र क्षय, योनि शूल आदि।

वस्ति के अयोग्य रोगी- भोजन किए बिना अनुवासन वस्ति तथा भोजन के उपरांत आस्थापन वस्ति के प्रयोग का निषेध है। साथ ही अतिकृश, कास, श्वास, जिन्हें उल्टियाँ (वमन) हो रही हों, उन्हें वमन नहीं देना चाहिए।

नस्य

नासिका द्वारा जो औषधि प्रयुक्त होती है, उसे नस्य कहते हैं। नस्य को गले तथा सिर के समस्त रोगों की उत्तम चिकित्सा कहा गया है।

मात्रा के अनुसार नस्य के दो प्रकार हैं-

  1. मर्श नस्य– 6, 8 या 10 बूँद नस्य द्रव्य को नासापुट में डाला जाता है।
  2. प्रतिमर्श नस्य– 1 बूँद या 2 बूँद औषध द्रव्य को नासापुट में डाला जाता है। इस नस्य की मात्रा कम होती है। अतः इसे प्रतिदिन भी लिया जा सकता है।

नस्य योग्य रोग- प्रतिश्याय, मुख की विरसता, स्वर भेद, सिर का भारीपन, दंत शूल, कर्ण शूल, कर्ण नाद आदि।

नस्य के अयोग्य रोगी- अत्यंत कृश व्यक्ति, सुकुमार रोगी, मनोविकार, अति निद्रा, सर्पदंश आदि।

शल्य चिकित्सानुसार पाँचवाँ कर्म ‘रक्त मोक्षण’ माना गया है। रक्त मोक्षण का अर्थ है शरीर से दूषित रक्त को बाहर निकालना।

डॉ. साहब से रायपुर, छत्तीसगढ़ के इन नंबर पर संपर्क किया जा सकता है : 9300012343, 9406010081, 0771-6998100

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