सरकार को सचेत तो नहीं कर रहे सिन्हा?

कृष्णमोहन झा

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं) 

पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने नोटबंदी एवं अर्थव्यवस्था को लेकर केन्द्र सरकार पर जो टिप्पणियां की हैं उस पर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं उनमें से सबसे प्रमुख तो यह है कि लगभग 80 वर्ष की आयु के वयोवृद्ध भाजपा नेता क्या संगठन अथवा सरकार में कोई महत्वपूर्ण भूमिका न मिलने के कारण व्यथित हैं और उनके अंदर की व्यथा एक अंग्रेजी अखबार में एक विचारोतेजक लेख के जरिए बाहर आ गई। एक अन्य अनुमान यह भी हो सकता है कि भाजपा के समर्पित नेता के रूप में सचमुच ही सरकार को सचेत करना चाह रहे है कि अब भी अगर वह नहीं संभली तो बहुत देर हो जाएगी। यहां यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि यशवंत सिन्हा केन्द्र में मोदी सरकार के गठन के बाद यह टिप्पणी भी कर चुके हैं कि 80 साल की आयु के ऊपर वाले भाजपा नेताओं को ब्रेनडेड मान लिया गया है। यशवंत सिन्हा की इस टिप्पणी का उस समय यह ही अर्थ निकाला गया था कि वे नई केन्द्र सरकार अथवा भारतीय जतना पार्टी दोनों में ही कोई महत्पूर्ण भूमिका न मिल पाने की वजह से बेहद व्यथित हो उठे हैं। अब यशवंत सिन्हा ने अपना ताजा लेख किस मंशा से लिखा है इस बारे में केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं परंतु बाद में अपने विरूद्ध की गई व्यंगोक्तियों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा है कि मैं भीष्म पितामह हीं हूं और देश की अर्थव्यवस्था का चीर हरण होते देखकर भी चुप नहीं बैठ सकता। जाहिर सी बात है कि वे अब चुप नहीं रहेंगे। भले ही उन्हें कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए मोदी सरकार अथवा भाजपा संगठन की ओर से कोई आमंत्रण मिले अथवा नहीं। उन्होंने यह संदेश तो केन्द्र सरकार को दे ही दिया है कि वे पार्टी में हाशिए पर भले ही पहुंचा दिए गए हों परंतु हाशिए पर रहकर भी अखबार की सुर्खियों में छा जाने का सामथ्र्य उनके अंदर आज भी मौजूद है।

केन्द्र की मोदी सरकार ने गत वर्ष 8 नवंबर को जब नोट बंदी का ऐतिहासिक और अभूतपूर्व फैसला किया था उसके बाद से ही सरकार लगातार आलोचनाओं के घेरे में है और इस घेरे से बाहर निकलने की कोई लालसा भी उसके अंदर नहीं दिखाई देती। ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ कि केन्द्र सरकार को नोटबंदी के फैसले पर कोई अफसोस है। सरकार पहले भी यह दावा कर रहीं थी और आज भी वह उसी दावे पर कायम है कि नोटबंदी का फैसला एक साहसिक कदम था और उसे अपेक्षित परिणाम तो देर सबेर मिलेंगे ही। भाजपा के एक अन्य वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंंत्री अरूण शौरी केन्द्र सरकार के इस साहसिक कदम की कुछ अलग ही ढांग से व्याख्या कर रहे जो शायद सरकार को पसंद नहीं आएंगी। अरूण शौरी कहते है कि कि सरकार ने नोटबंदी करके जो साहस दिखया है वैसा साहस आत्महत्या के लिए भी जरूरी होता है। पूर्व प्रधानमंत्री एवं प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह, नोबल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन सहित अनेक नामचीन हस्तियां भी नोट बन्दी के नकारात्मक परिणामों की आशंका व्यक्त कर चुकी हैं परंतु सरकार इसे किसी भी प्रकार से गलत मानने के लिए तैयार नहीं है। नोटबंदी को लेकर उसके ऊपर जारी आक्रमणों को निस्तेज करने के लिए सरकार के तरकश में तीरों की कभी कोई कमी पड़ेगी ऐसी आशंका व्यक्त करना बेमानी ही साबित होगा।

पूर्व वित्तमंत्री के आरोपों को भले ही सरकार ने गंभीरता से लेने की जरूरत महसूस की हो परंतु एक बात तो निश्चित रूप से कही जा सकती है कि जीएसटी एवं नोटबंदी से मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग की परेशानियां बढ़ी है और अच्छे दिनों का नारा अगले लोकसभा चुनावों के एक साल पहले अप्रासंगिक बना चुना है। सरकार का यह तर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा है कि धीरे धीरे सब सामान्य हो जाएगा। सरकार को जनता के इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब तो देना ही पड़ेगा कि आखिर वह समय सीमा कौन सी है जिसकी समाप्ति के बाद जनता को सब ठीक ठाक लगने लगेगा। भारतीय जनता पार्टी से यह सवाल पूछा जा सकता है कि क्या उसने 2014 के लोकसभा चुनाव जीतने के लिए ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का जो लोकलुभावन नारा दिया था वहीं नारा 2019 के लोकसभा चुनावों में भी दोहराया जाएगा क्योंकि आज की तारीख में तो सरकार यह दावा करने की स्थिति में तो कतई नहीं है कि अच्छे दिन आ चुके है। 

केन्द्र सरकार पूर्व वित्तमंत्री के सवालों का उत्तर देने के लिए जिन आंकड़ों का सहारा ले रहीं है वे आंकड़े आम जनता की समझ से बाहर के हैं। आम जनता को तो महंगाई से राहत चाहिए। रोजगार के अवसरों में वृद्धि चाहिए। गरीबी से उबरने के लिए सरकार की ओर से ऐसी योजनाएं शुरू किए जाने का उसे बेसब्री से इंतजार है जिसका प्रत्यक्ष लाभ उसे दिखाई दे। क्या आम जनता को ऐसी कड़वी सच्चाई से कोई राहत महसूस हो सकती है कि विकास की कोई कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। 

आंकड़ों के खेल में उलझाकर देश की जनता को आखिर कब तक बहलाया जा सकता है। उसे तो रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों के बढ़ते भावों को उसकी पहुंच के अंदर लाने वाले कदमों की प्रतीक्षा है। सरकार ने ऐसी कई योजनाएं प्रारंभ की है जो गरीबों के लिए हितकारी है परंतु जनता अब अधीर हो उठी है उसे तत्काल राहत की दरकार है। वर्तमान सरकार पिछली सरकार की गलत नीतियों का उदाहरण देकर अपना बचाव आखिर कब तक करती रहेगी। पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा कहते हैं कि 40 महीने सरकार में रहने के बाद हम पहले की सरकारों को दोष नहीं दे सकते। हमें पूरा मौका मिला है अब परिणाम चाहिए। बिहार के भाजपा सांसद ने यशवंत सिन्हा का पक्ष लेते हुए कहा है कि सिन्हा देश के सफल वित्तमंत्री रहे है। उन्होंने आर्थिक मंदी को लकर आईना दिखाया है उसे गंभीरता से दिखाना चाहिए। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने हाल में ही कहा था कि केन्द्र में पिछली यूपीए सरकार के कार्यकाल में भी अर्थिक विकास दर 8 बार 5.7 प्रतिशत से नीचे आई थी। प्रधानमंत्री की बात से इंकार नहीं किया जा सकता परंतु यदि वर्तमान सरकार ने देश की जनता को अच्छे दिन दिखाने का भरोसा दिलाया है तो उसे पूरा करने की उम्मीद भी तो जनता सकरार से की कर सकती है। जीएसटी की जटिलताओं के कारण छोटे व्यापारियों को हेने वाली कठिनाईयों को दूर करने के लिए सरकार ने रिटर्न भरने के नियम बदले हैं परंतु इससे भी बड़े कदमों की दरकार जनता को है। हाल में ही उद्योग जगत की प्रतिनिधि संस्था एसोचैम ने भी इस बात पर जोर देकर कहा है कि केन्द्र सरकार को वस्तु एवं सेवाकर तथा नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती को दूर करने के लिए ऐसे कदम उठाने चाहिए जिनसे रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो तथा उपभोक्ता मांग भी बढ़े। प्रधानमंत्री ने हाल में ही आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन किया है जो सरकार को आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए जरूरी कदमों के बारे में सुझाव देगी। इससे इस हकीकत का पता तो चलता ही है कि सरकार को भी सुधार की गुंजायश का अहसास हो चुका है। 

अगले लोकसभा चुनावों के लिए लगभग डेढ़ वर्ष का समय शेष है। इस अवधि में सरकार को अपने अभी तक के कार्यक्रमों एवं नीतियों की समीक्षा कर उनमें अपेक्षित सुधार लाने की इच्छा शक्ति का प्रदर्शन करना होगा। अगले डेढ़ वर्षों में अगर पिछली संप्रग सरकार के गलत कदमों से तुलना करने के बजाय केवल अपने अच्छे कदमों की चर्चा करना ही इस सरकार की नीति होना चाहिए। अच्छे कदम उठाकर ही अच्छे दिनों के आगमन की उम्मीदें बंधाई जा सकती हैं। क्या सरकार 2019 के लोकसभा चुनावों में यह दावा करने की स्थिति में नहीं आना चाहेगी कि अच्छे दिन आ चुके हैं। अगर 2019 के चुनावों तक जनता को सचमुच ही यह सरकार अच्छे दिनों की सुखानुभूति कराने में सफल हो तो उसे जनता खुद ही सर आंखों पर बिठाएगी। आखिर नया भारत का नागरिक होना तो हर भारतीय के लिए गर्व की बात होगी। 

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