कृष्णमोहन झा

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

अमेरिका के राष्ट्रपति पद की बागडोर डोनाल्ड ट्रंप के हाथों में आने के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा था कि यदि हमारे पड़ोसी पाकिस्तान ने आतंकवादी संगठनों को प्रश्रय देना बंद नहीं किया तो अमेरिका उसके प्रति पहले की तुलना में कही अधिक कठोरता से पेश आएगा। डोनाल्ड ट्रंप ने इस आशय के बयान जब एकाधिक बार दिए तो भारत का यह उम्मीद लगाना स्वाभाविक था कि अमेरिका अब पाकिस्तान को सचमुच में कोई कड़ा सबक सिखाने का फैसला कर चुका है जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान अपने अंदर फलफूल रहे आतंकी संगठनों पर लगाम कसने के लिए विवश हो जाएगा परंतु अमेरिकी सरकार के रक्षामंत्री जिम मैटिस और विदेश मंत्री जेम्स टिलरसन ने हाल में ही संपन्न अपने भारत प्रवास के दौरान इस संबंध में जो विचार व्यक्त किए उनसे इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल था कि डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी से पाकिस्तान घबराकर अब आतंकी संगठनों को नियंत्रित करने के लिए जल्दी ही कठोर कदम उठाएगा। अमेरिकी विदेशमंत्री मैटिस और रक्षामंत्री जेम्स टिलरसन ने भारत यात्रा के साथ ही पाकिस्तान प्रवास का कार्यक्रम भी तय कर रखा था। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सरकार के इन दोनों वरिष्ठ मंत्रियों को 6 देशों की यात्रा पर भेजकर दरअसल यह संदेश देना चाहा था कि अमेरिका अब इस क्षेत्र में नई भूमिका निभाने के लिए तैयार हो चुका है और इन नई भूमिका में आतंकवाद का खात्मा इसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसीलिए मैटिस और टिलरसन ने भारतीय रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ अपनी बातचीत में इस बात पर विशेष जोर दिया कि अमेरिका अनेक आतंकी संगठनों को पाकिस्तान में मिल रहे संरक्षण को गंभरता से ले रहा है और इसे अब अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता वैसे अमेरिका द्वारा यह चेतावनी पाकिस्तान को अनेकों बार दी जा चुकी है और इसका पाकिस्तान पर क्या असर हुआ है यह भी भारत भली भांति जानता है इसलिए निर्मला सीतारमण एवं सुषमा स्वराज ने अपने अमेरिकी समकक्षों को यह जताने में संकोच नहीं किया कि राष्ट्रपति ट्रम्प की आतंकवाद विरोधी नीति तभी कामयाब होगी जबकि पाकिस्तान सचमुच ही आतंकवादी संगठनों को प्रश्रय देना बंद कर उन पर लगाम कसने के लिए कठोर कदम उठाएगा। भारत ने आतंकवाद के विरूद्ध जो लड़ाई छेड़ रखी है उसमें अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोग यही हो सकता है कि वह पाकिस्तान पर इस तरह के दबाव बनाए कि आतंकवादी संगठनों पर लगाम कसना उसकी विवशता बन जाए। टिलरसन ने यद्यपि अपनी हाल की भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ अपनी बातचीत में यह भरोसा दिलाया है कि अमेरिका और भारत आतंकवाद को परास्त करने के लिए मिलकर लड़ाई लड़ेंगे परंतु ट्रम्प के बार बार बदलते बयान यही संकेत देते है कि पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी हमदर्दी में उतनी कमी तो नहीं आई है जितनी भारत कर रहा है। यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि एक ओर तो अमेरिकी राष्ट्रपति पाकिस्तान को यह चेतावनी देते हैं कि पाकिस्तान को आतंकवादी संगठनों की शरण स्थली नहीं बननी चाहिए और दूसरी ओर अमेरिकी रक्षामंत्री पाकिस्तान में जाकर यह बयान देने से परहेज नहीं करते कि हम पाकिस्तान के साथ मिलकर काम करने हेतु उसे एक मौका और देना चाहेंगे। इस तरह के बयान दरअसल पाकिस्तान को यह सोचने का हौसला प्रदान करते है कि अमेरिका आतंकवाद विरोध लड़ाई उसको साथ लिए बिना जारी नहीं रख सकता। यह बात काफी हद तक सही भी है, क्योंकि तालिबान आतंकियों एवं हक्कानी गुट से निपटने के लिए पाकिस्तान का सहयोग अमेरिका के लिए जरूरी है। इसी कारण अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने की भी शायद एक सीमा तय कर रखी है। पाकिस्तान भी यह अनुमान लगा चुका है कि अमेरिका इस तय सीमा के आगे जाने से परहेज करता रहेगा। पाकिस्तान को जब से चीन का संरक्षण मिलना प्रारंभ हुआ है तबसे तो वह अमेरिकी चेतावनियों की भी उपेक्षा करने में संकोच नहीं कर रहा है। मसूद अजहर जैसे कुख्यात आतंकवादी को संयुक्त राष्ट्र के घोषित आतंकवादियों की सूची में शामिल करने के भारत के प्रस्ताव पर जिस तरह चीन ने सुरक्षा परिषद में वीटों किया उसे पाकिस्तान को और प्रेत्साहन मिला है। चीन ने यह संकेत दे दिया है कि वह आगे भी इस तरह के कदम उठा सकता है।

दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प चाहते है कि अफगानिस्तान में आतंकी गुटों के सफाए हेतु अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे सैन्य अभियन में भारत भी उसका साझीदार बने परंतु अमेरिका के इस प्रस्ताव को भारत ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया है कि भारत किसी अन्य देश में अपनी सेनाएं केवल शांति कार्यों एवं पुनर्निमाण में सहयोग के लिए भेजने की नीति पर चलता रहेगा। इससे अमेरिका को यह संदेश तो मिल ही चुका है कि भारत अमेरिका के साथ अपने मैत्री संबंधों को मजबूत करने की दिशा में हर संभव कदम उठाएगा परंतु फैसले लेने की स्वतंत्रता को कभी प्रभावित नहीं होने देगा। अमेरिका ने इस सच्चाई को भलीभांति समझ लिया है परंतु भारत का भरोसमंद साथी बना रहना चाहता है क्योंकि अमरीका को दक्षिण एशिया में भारत के समान कोई दूसरा सच्चा दोस्त नहीं मिल सकता। भारत ने अमेरिका को यह भरोसा दिलाने में कामयाबी हासिल कर ली है कि वह अमेरिका से अपनी प्रगाढ़ होती मैत्री को कभी कमजोर नहीं होने देगा। टिलरसन ने भी अपने भारत प्रवास के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया कि अमेरिका भी भारत का भरोसेमंद साथ रहेगा।

हाल में ही टिलरसन के भारत प्रवास के दौरान विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के साथ उनकी सौहाद्र्रपूर्ण माहौल में हुई बातचीत से यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि अमेरिका भी भारत के साथ अपने प्रगाढ़ होते संबंधों की अहमियत से वाकिफ है। अमेरिकी रक्षामंत्री ने माना कि भारत उसका पुराना सहयोगी और मित्र है। अमेरिका की अफगानिस्तान नीति में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। भारत ने अमेरिका के प्रति समर्थन व्यक्त करते हुए सैन्य अभियान में साझेदारी सें इंकार करने में संकोच नहीं किया। उत्तर कोरिया के मुद्दे पर भी चर्चा हुई जिस पर भारतीय विदेश मंत्री का कहना था कि संवाद की गुंजायश बनी रहना चाहिए। भारत-अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई जिसका भारत के लिए विशेष महत्व है। टिलरसन ने भरोसा दिलाया कि भारत को सैन्य उपकरणों की आपूर्ति जारी रखने के साथ ही सैन्य आधुनिकीकरण के लिए अमेरिका सहयोग करता रहेगा।

कुल मिलाकर अमेरिका के दो मंत्रियों को एक माह के अंदर ही भारत प्रवास पर आना यही साबित करता है कि अमेरिका को दक्षिण एशिया में भारत जैसे भरोसेमंद दोस्त की अब पहले से कही अधिक जरूरत है। चीन की विस्तारवादी नीति और पाकिस्तान के साथ उसकी बढ़ती हुई घनिष्टता को देखते हुए अमेरिका अगर इस क्षेत्र में भारत के प्रभाव को बढ़ाने में दिलचस्पी दिखा रहा है तो इसमें उसका खुद का हित भी निहित है।

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