झारखंड में होली पर जानवरों के शिकार की आदिम परंपरा

गुमला : होली रंगों त्योहार है. आपसी प्रेम व भाईचारा का पर्व. गुमला जिले में होली का पर्व सभी जाति, धर्म के लोग मिलकर मनाते हैं. समय बदला. सामूहिक रूप से होली पर्व मनाने की परंपरा नहीं बदली.

इसी तरह पहाड़ व जंगलों में रहने वाले विलुप्तप्राय आदिम जनजाति ने भी अलग अंदाज में इस दिन को मनाने की परंपरा नहीं छोड़ी.

होली के एक दिन पहले आदिम जनजाति में शिकार (जंगल में घूमकर बंदर, खरगोश, सूकर, सियार व भेड़िया का शिकार) करने की परंपरा है. यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है.

विमलचंद्र असुर कहते हैं कि समय के साथ सब कुछ बदल रहा है. लेकिन, झारखंड की आदिम जनजातियों ने इस परंपरा को आज भी संजो रखा है.

उन्होंने बताया कि आदिम जनजाति के लोग दिन भर जंगल में शिकार करते हैं. शाम को थकावट दूर करने के लिए नाचते हैं, गाते हैं. खाते हैं, पीते हैं.

बिरहोर व कोरवा जातियां देश से खत्म हो रही है, लेकिन गुमला में इनकी अच्छी-खासी संख्या है. ये लोग आज भी जंगलों में और पहाड़ों पर रहते हैं.

होली पर्व पर ये लोग तीर-धनुष लेकर घने जंगलों में शिकार के लिए निकल जाते हैं. इनका शिकार मुख्यत: बंदर व खरगोश होता है. इसके बाद एक स्थान पर जुटकर सामूहिक रूप से खाते-पीते व नाचते-गाते हैं.

असुर जनजाति में महिला व पुरुष दोनों शिकार करते हैं. इनमें शिकार करने के अलग-अलग कायदे हैं. पुरुष वर्ग जंगल में जाकर जंगली सूकर, सियार या भेड़िया का शिकार करते हैं. वहीं महिलाएं तालाब, नदी व डैम में मछली मारती हैं.

अब नहीं दिखता फाग नृत्य

एक समय था, जब फाग व झूमर नृत्य की झारखंड प्रदेश में अपनी धाक थी. आज यह नृत्य अंतिम सांसें गिन रहा है. गांवों में भी रौनक खत्म हो रही है.

फाग नृत्य को फगुवा नृत्य के नाम से भी जाना जाता है. इस नृत्य के दौरान गाये जाने वाले गीतों में भगवान शिव व राधा-कृष्ण के अलावा प्रकृति का वर्णन किया जाता है.

इस नृत्य का अपना एक समय तय है. जब न गर्मी, न ठंड रहती है, सारा वातावरण खुशनुमा होता है, पलास व सेमर के लाल फूल चारों ओर खिले होते हैं. ऐसे में आता है होली का त्योहार. इसी वक्त फाग गीत व नृत्य से वातावरण गूंज उठता है.

खासकर सदानों के लिए यह समय अच्छा होता है. झूमर पुरुष प्रधान नृत्य है. कुछ स्थानों पर स्त्रियां इसमें भाग लेती हैं. होली पर्व की समाप्ति के बाद इस नृत्य का नजारा देखने को मिलता है.

इसमें भाग लेने वाले पुरुष धोती कुर्ता, अचकन, सिर पर पगड़ी, गले में माला, ललाट पर टीका व कानों में कुंडल पहनते हैं. इस नृत्य में प्रकृति का वर्णन रहता है. आज यह नृत्य विलुप्त होने लगा है.

(साभार : प्रभात खबर)

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