मंडी की देवी मड़ई (गहिरा-मड़ई 7वाँ वर्ष) 01 फरवरी 2026 को

रायपुर। दोहा यादवों का प्रिय छंद है। रसों में वीर रस बहुत भाता है। चंडी ताल पर लाठियाँ व तलवार लहराकर ये अपना शौर्य प्रदर्शन करते हैं। गहिरा मड़ई वस्तुतः युद्ध नृत्य है। योद्धाओं का नर्तन। वे युद्ध भूमि को ऐसे ही मस्त गाते बजाते नाचते ललकारते जाया करते थे। मातर या मातृ पूजा तो पूरी तरह युद्ध आधारित त्यौहार है।

गहिरा मड़ई में रास भी सम्मिलित हो गया है। राधाकृष्ण एवं गोप-गोपियों से संबंधित संयोग वियोग श्रृंगार पर आधारित दोहा के साथ सामूहिक एवं वैक्तितः चक्राकार में घुम-घुम कर छम-छम नाचना रास का ही लक्षण है। नीति निदेशक दोहे भी गहिरा मड़ई में बहुतायत में सुनाई नेता है जो हमें सदाचरण को प्रेरित करता है। ये नीति निदेशक मीठे, चुटले और गंभीर होते हैं। हमारा गहिरा मड़ई इस रास व उपदेश के सम्मिलन को स्वीकार करता है। आजकल कथात्मक नृत्य ज्यादा चलन में है। पौराणिक कथाओं पर आधारित नृत्य। यह अत्यधिक मधुर मोहक व ज्यादातर शिक्षाप्रद विधा है। अभी-अभी चलन में आया है। गहिरा मड़ई का यह कथात्मक नृत्य लोकप्रिय होता जा रहा है। गहिरा-मड़ई में इसका स्वागत है।

पौराणिक मान्यता है कि आज भी कही भी बाजार हाट लगता है तो उसका पहली बोहनी या पहला ग्राहक परेतीन दाई करती है। तब बाजार हाट गुलजार होता है। आज भी हमारी दादी नानी, परेतीन दाई के लिए घर में नया मेहमान (बाल-गोपाल) आने पर परेतीन दाई के नाम से चुड़ी पाट, बांस की छोटी टोकनी, चना मुर्रा, लाई को बोईर, ईमली के पेड़ में उनका निवास रहता है कहकर अर्पण कर अपने बालगोपालों का दीर्घ आयु एव स्वस्थ जीवन की कामना को लेकर आज भी यह परम्परा ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी चली आ रही है। मगर शहरी क्षेत्र में आधुनिकता की चका-चौन्द में एकल परिवार में रहने के कारण यहछत्तीसगढ़ी दादी-नानी की पारम्परिक (टोटका) विरासत विलुप्त की कगार में हैं।

जिसकी संरक्षण संवर्धन का प्रयास सर्व छत्तीसगढ़िया समाज के सहयोग से छत्तीसगढ़ कोसरिया अहीर यादव सेवा समाज द्वारा छत्तीसगढ़ की राजधानी श्री हरदेवलाला मंदिर प्रांगण, वार्ड क्र. 63 से विधि-विधान पूजा अर्चना चुड़ीपाट, श्रीफल और नया लुगरा अर्पण कर गहिरा मड़ई का शुभारंभ किया जाता है।

समापन जय श्री बाबा हटकेश्वर नाथ धाम, महादेव घाट में पूजा अर्चना व राऊत दल को पुरस्कृत कर समापन किया जाता है।

प्रथम पुरस्कार – 16000/ रुपये द्वितीय पुरस्कार 11000/- रुपये, तृतीय पुरस्कार 700०/- रुपये चतुर्थ पुरस्कार -5000/- रुपये, पंचम से अंतिम तक सभी गहिरा मडई व राऊत नाच दल को

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3000/- नगद पुरस्कार प्रदान किया जायेगा ।